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सनातन शंकर
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निग्रहस्थानों द्वारा आर्यसमाजी मत की पराजय: एक तार्किक विश्लेषण
धर्म और आध्यात्म

निग्रहस्थानों द्वारा आर्यसमाजी मत की पराजय: एक तार्किक विश्लेषण

क्या ईश्वर सर्वशक्तिमान होकर भी अवतार नहीं ले सकता? जानिए न्याय शास्त्र के निग्रहस्थानों के माध्यम से आर्यसमाजी तर्कों का तार्किक खंडन।

निग्रहस्थानों द्वारा आर्यसमाजी मत की पराजय — बिंदुवार प्रस्तुति न्याय शास्त्र के निग्रहस्थानों के आधार पर अवतारवाद के विरुद्ध दिए जाने वाले आर्यसमाजी तर्कों का तार्किक विश्लेषण और खंडन:

(१) प्रतिज्ञाहानि आर्यसमाजी प्रतिज्ञा: “ईश्वर सर्वशक्तिमान है।”

दोष: फिर वही कहना कि “ईश्वर अवतार नहीं ले सकता”, यह उसकी अपनी ही प्रतिज्ञा का नाश है। यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है, तो अपनी इच्छा से रूप-प्राकट्य में असमर्थ कैसे? और यदि वह ऐसा नहीं कर सकता, तो उसकी सर्वशक्तिमत्ता की प्रतिज्ञा ही नष्ट हो गई।

उदाहरण: यदि कोई कहे — “राजा सर्वसमर्थ है”, फिर कहे — “वह अपने राज्य में प्रवेश ही नहीं कर सकता”, तो पहली बात स्वयं टूट जाती है।

(२) प्रतिज्ञाविरोध आर्यसमाजी कथन: “ईश्वर सर्वव्यापक है, सबके भीतर स्थित है, सबका कर्ता है।”

तर्क: यदि ऐसा है, तो मानव-रूप में उसका प्रकट होना निषिद्ध कैसे? जो सर्वत्र है, वह अवतार में भी होगा ही। अतः अवतार का निषेध उसके अपने ही सर्वव्यापकत्व के विरुद्ध पड़ता है।

उदाहरण: जब सूर्य का प्रकाश हर जगह पहुँच सकता है, तो दर्पण में प्रतिबिम्बित होने से उसे कौन रोक सकता है?

(३) अर्थान्तर स्थिति: जब अवतारवादी कहता है— “अवतार ईश्वर का स्वेच्छा से दिव्य प्राकट्य है।” तब आर्यसमाजी उत्तर देता है— “ईश्वर जन्म-मरण वाला नहीं।”

दोष: यह उत्तर विषय से हटकर है। क्योंकि अवतारवादी कर्मबद्ध, दुःखमय जन्म की बात नहीं कर रहा, बल्कि स्वेच्छा से प्राकट्य की बात कर रहा है। परन्तु आर्यसमाजी मूल विषय छोड़कर दूसरे प्रकार के जन्म-दोष की चर्चा करने लगता है।

उदाहरण: कोई कहे — “राजा स्वयं जनता के बीच आया”, और दूसरा उत्तर दे — “राजा तो सामान्य भिखारी नहीं है।” यह मूल विषय का उत्तर नहीं हुआ।

(४) अप्रतिभा स्थिति: जब पूछा जाता है— “यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है, तो अवतार लेने में असमर्थ क्यों?” तब आर्यसमाजियों के पास कोई युक्तिसंगत उत्तर नहीं होता।

दोष: वे केवल बार-बार यही दोहराते हैं— “ईश्वर अजन्मा है।” किन्तु “अजन्मा” होने से “स्वेच्छा से प्रकट न हो सकना” कैसे सिद्ध हुआ — इसका उत्तर नहीं दे पाते।

उदाहरण: जैसे कोई विद्यार्थी प्रश्न का उत्तर न देकर केवल वही रटी हुई पंक्ति बार-बार दोहराता रहे।

(५) पुनरुक्ति दोष: आर्यसमाजी बार-बार केवल यही कहता है— “ईश्वर अजन्मा है,” “ईश्वर निराकार है,” “ईश्वर देह नहीं लेता।” परन्तु सिद्धान्ती द्वारा दिए गए तर्कों का खण्डन नहीं करता। केवल एक ही वाक्य की पुनरावृत्ति करता रहता है।

उदाहरण: वाद-विवाद में कोई व्यक्ति हर प्रश्न पर सिर्फ “ऐसा नहीं हो सकता” कहता रहे, पर कारण न बताए।

(६) सत्प्रतिपक्ष हेत्वाभास तर्क: “देह ग्रहण करना सीमाबद्ध होना है, इसलिए ईश्वर अवतार नहीं ले सकता।”

खंडन: यह दोषपूर्ण तर्क है क्योंकि योगियों में सूक्ष्म देह का व्यवहार देखा जाता है, सूर्य अनेक जलपात्रों में प्रतिबिम्बित होता है, अभिनेता अनेक वेश धारण करता है, फिर भी वे वास्तविक रूप से सीमाबद्ध नहीं हो जाते। अतः “रूप-प्राकट्य = बन्धन” यह नियम सर्वत्र सत्य नहीं।

उदाहरण: अभिनेता राजा का पात्र निभाए तो वह सचमुच राजा नहीं बन जाता, न अपनी वास्तविक पहचान खोता है।

(७) बाधित हेतु दावा: “अवतारवाद वेद-विरुद्ध है।”

प्रमाण: वेदों में भी ईश्वर के अनेक रूपों में प्रकट होने का वर्णन मिलता है— “एकोऽहं बहुस्याम्”, “अजायमानो बहुधा विजायते”, “तदेवानुप्राविशत्”। भगवद्गीता भी कहती है— “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।” अतः आर्यसमाजी का हेतु श्रुति और स्मृति दोनों से बाधित हो जाता है।

|| निर्णायक सिद्धान्त || अवतारवाद में दोष तभी तक कल्पित हो सकते हैं, जब तक अवतार को सामान्य जीव का कर्मबद्ध जन्म माना जाए। किन्तु सिद्धान्त में— अवतार कर्मबन्ध नहीं, अविद्या की उत्पत्ति नहीं, प्रकृति की पराधीनता नहीं, बल्कि “परमात्मा का स्वेच्छा से दिव्य प्राकट्य” माना जाता है। यह स्वीकार करते ही सारे दोष समाप्त हो जाते हैं।

इसलिए यहाँ— “बाधित हेतु” निग्रहस्थान है।

|| निर्णायक सिद्धान्त || अवतारवाद में दोष तभी तक कल्पित हो सकते हैं, जब तक अवतार को सामान्य जीव का कर्मबद्ध जन्म माना जाए। किन्तु सिद्धान्त में—

अवतार कर्मबन्ध नहीं,

अविद्या की उत्पत्ति नहीं,

प्रकृति की पराधीनता नहीं,

बल्कि— “परमात्मा का स्वेच्छा से दिव्य प्राकट्य” माना जाता है। यह स्वीकार करते ही सारे दोष समाप्त हो जाते हैं।

|| पराजय-घोषणा || अतः— प्रतिज्ञाहानि, प्रतिज्ञाविरोध, अर्थान्तर, अप्रतिभा, पुनरुक्ति, सव्यभिचार हेत्वाभास, तथा बाधित हेतु —इन सब दोषों से आर्यसमाजियों का अवतार-निषेध न्यायशास्त्र की दृष्टि से भग्न, पराजित और निरस्त सिद्ध होता है।

इसलिए सिद्ध हुआ कि—

अवतारवाद तर्क-विरुद्ध नहीं है।

और न ही यह ईश्वर की महिमा के विरोध में है।

अपितु— अवतारवाद ही ईश्वर की पूर्ण स्वतंत्रता, करुणा और सर्वशक्तिमत्ता का सर्वोच्च प्रकाश है।

Credit आचार्य रामसरण शुक्ल जी

तर्क, तथ्य और सनातन सत्य का मार्ग।